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मैं तेरी खूबियां लफ्जों में किस तरह ढालूं, ये हक अदा नहीं होता मेरे बयां से कभी: इकबाल अशहर
विशेष संवाददाता
गाजियाबाद। मशहूर शायर और 'बारादरी' के अध्यक्ष गोविंद गुलशन की स्मृति में आयोजित महफ़िल ए बारादरी में देश भर के कवि और शायरों ने उनसे जुड़ी यादों और अनुभव साझा किए। इस अवसर पर उनके ताजा गजल संग्रह 'कल न कल तो तेरे..' का लोकार्पण भी किया गया। कार्यक्रम अध्यक्ष सुरेंद्र सिंघल ने कहा कि एक तरफ अदब की दुनिया से जहां 'उस्ताद शागिर्द परंपरा' खत्म होती जा रही 'बारादरी' इस परंपरा के निर्वहन का बेमिसाल उदाहरण है। जहां गोविंद गुलशन की सरपरस्ती में शायरों की एक सशक्त जमात सामने आई है। देश के विख्यात शायर इकबाल अशहर ने कहा कि गोविंद गुलशन की 'बरादरी' को हरा भरा रखना हम सबकी जिम्मेदारी है।
नेहरू नगर स्थित सिल्वर लाइन प्रेस्टीज स्कूल में गोविंद गुलशन के जन्मदिन के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम दो सत्रों में संपन्न हुआ। पहले सत्र में उनके ताजा गजल संग्रह 'कल न कल तो तेरे...' का लोकार्पण के साथ उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा हुई। दूसरे सत्र में लोगों ने कलाम के जरिए गुलशन जी के प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त किया। संस्था की संस्थापक अध्यक्ष डॉ. माला कपूर 'गौहर' ने कहा कि बारादरी गुलशन जी की वह बगिया है जिसकी खुशबू से आज पूरा देश महक रहा है। उन्होंने कहा कि गजल लेखन के क्षेत्र में वह एक मोती जैसी थी, जिसे निखार कर गुलशन जी ने 'गौहर' बना दिया। उन्होंने अपनी पंक्तियों 'इतना मशहूर कर दिया हमको, खुद से दूर कर दिया हमको, बोझ गम का उठाए फिरते हैं, कैसा मजदूर कर दिया हमको' के जरिए अपनी भावनाएं व्यक्त की। अपनी नज्म की पंक्तियों 'तेरी आंखों को सुन रहा हूं मैं, दिख रही है मुझे तेरी आवाज, स्वाद लेता हूं तेरी खुशबू का, तेरी आहट को सूंघ लेता हूं, फिर तेरी सोच को छूकर, तुझ में खो जाता हूं कुछ ऐसे मैं, ढूंढना पड़ता है मुझे खुद को...' के जरिए सुरेंद्र सिंघल ने अपनी भावनाएं व्यक्त की।
कार्यक्रम में विशेष रूप से आए मशहूर शायर इकबाल अशहर ने अपने शेर 'अलग ना होंगे ये किरदार दास्तां से कभी, अजीम लोग गुजरते नहीं जहां से कभी। चमकने लगते हैं आंखों में आंसुओं की तरह, सितारे टूट भी जाएं जो आसमां से कभी। मैं तेरी खूबियां लफ्जों में किस तरह ढालूं, ये हक अदा नहीं होता मेरे बयान से कभी। बिछड़ने वालों में उसका शुमार कैसे हो, वह आदमी तो गया ही नहीं यहां से कभी' के जरिए अपनी भावनाएं व्यक्त की। संस्था की संरक्षिका डॉ. उर्वशी अग्रवाल 'उर्वी' ने कहा कि 'बारादरी' के रूप में जो विरासत गुलशन जी हमें सौंप गए हैं उसे आबाद रखना हमारी जिम्मेदारी है। उन्होंने दोहों 'रहता है संसार में खुशबू की मानिंद, गुलशन से जाता नहीं, कोई भी गोविंद', 'फूल-फूल पर भाव का, छिड़का हुआ पराग, गजल तुम्हारे द्वार पर, जलता रहे चराग', 'खुशबू, चंदन या हिना, छाया हो या धूप, सभी यहां मौजूद हैं, गुलशन जी के रूप' के रूप में अपनी भावनाएं व्यक्त की। मुख्य अतिथि कृष्ण कुमार 'नाज़' ने कहा कि गुलशन जी उनके गुरू भाई ही नहीं मार्गदर्शक भी थे। उन्होंने कहा कि स्मृतियों की पुस्तक में ऐसे बहुत से मुड़े हुए पन्ने हैं जो यादों में गुलशन जी को महफूज रखेंगे। उन्होंने अपनी कविता 'आंसू' की पंक्तियों 'अपना घर छोड़ के, खुश कौन भला रह पाया, किस को मिल पाई है, परदेस में सुख की छाया, आंसुओं मेरा कहा मानोगे, तो संवर जाओगे, अगर आंखों से निकलोगे तो मर जाओगे' के जरिएअपने भाव व्यक्त किए।
अति विशिष्ट अतिथि और संग्रह की प्रकाशक अलका मिश्रा ने कहा कि गोविंद गुलशन की प्रेरणा से ही उन्होंने गजल की बारिकियां सीखीं। उनके न रहने के बाद उन जैसे नए लिखने वालों की हौसला अफजाई कौन करेगा? शायर बी. के. वर्मा 'शैदी' ने अपनी नज्म 'जिन्दगी खूब गुजारी थी गजल की मानिंद, इब्तिदा बन गई हस्ती की सूरते मतला, वक्त की पड़ गई कुछ यूं निगाहे बद आखिर, साले-नौ बन गया पुरसोज गजल का मकता' के जरिए माहौल को गमगीन कर दिया। इस अवसर पर शायर असलम राशिद को 'बारादरी सृजन सम्मान' प्रदान किया गया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि उस्ताद शायर गोविन्द गुलशन गजल की आबरू को कायम रखने, अदब और तहजीब को जीने वाले शायर थे। उन्होंने रवायती गजल के दामन को भी थामे रखा और जदीद लहजे को भी अपनाया। उन्होंने गुलशन जी के शेर 'हम से बिछड़ गए हैं वो वादा किए बगैर, रहना पड़ेगा धूप में साया किए बगैर। मरने का खौफ इसलिए रहता नहीं मुझे, मैं जी रहा हूं कोई तमन्ना किए बगैर' से महफिल को गमजदा कर दिया। अपने शेर 'याद उसकी लड़ रही है दूसरी इक याद से, मेरे अंदर संगबारी हो रही है इन दिनों। छोड़ कर जाने लगे हैं कैसे कैसे प्यारे लोग, जिन्दगी से मौत प्यारी हो रही है इन दिनों' के जरिए अपने भाव प्रकट किए। गोविंद गुलशन की बेटी और शायरा खुशबू सक्सेना ने फ़रमाया 'तुम अगर हमसफर नहीं होते, तो मेरी हिम्मत कहीं बिखर जाती। वो अगर मुझको सांत्वना देता, मेरी आवाज और भर जाती'।
इस अवसर पर पंडित सत्यनारायण शर्मा, कमलेश त्रिवेदी फर्रुखाबादी, योगेंद्र दत्त शर्मा, जगदीश पंकज, वी. के. शेखर, डॉ. तारा गुप्ता, अनिमेष शर्मा 'आतिश', राजमणि, रवि पाराशर, तूलिका सेठ, प्रदीप भट्ट, सुरेंद्र शर्मा, अमर पंकज, हशमत भारद्वाज, इकरा अम्बर, संजीव निगम, मनीषा जोशी, वागीश शर्मा, संजीव शर्मा, आशीष मित्तल और यश शर्मा ने संस्मरणों व काव्यपाठ के जरिए अपनी भावनाएं व्यक्त की। वरिष्ठ व्यंग्यकार सुभाष चंदर, रश्मि सक्सेना, खुशबू सक्सेना, हिना सक्सेना, छाया सक्सेना, गुनगुन, राजेश सक्सेना, निशमा सक्सेना, सुभाष अखिल, ओंकार सिंह, अवधेश श्रीवास्तव, अशोक अग्रवाल, कुलदीप, कृष्ण प्रसाद विश्वकर्मा, शशिकांत भारद्वाज, आशीष मैत्रेय, अक्षयवर नाथ श्रीवास्तव, गुनप्रीत कौर, हरीश कुमार, सुमन गोयल, संकल्प श्रीवास्तव, संजय भदौरिया, उत्कर्ष गर्ग, गरिमा तोमर, शलभ अग्रवाल, अनु शाह, मुस्कान शाह, प्रतिमा श्रीवास्तव, डॉ. बीना शर्मा, अजय मित्तल, प्रज्ञा मित्तल, दीपा गर्ग, विपिन शर्मा और प्रभजोत कौर समेत बड़ी संख्या में श्रोता मौजूद थे।






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