*🌼मिट्टी में गढ़ा गणेशजी का मंगलमय स्वरूप, संस्कारों में रचा प्रकृति-संरक्षण का संकल्प*
*💥ऋषिकुमारों ने पर्यावरण-अनुकूल भगवान श्री गणेश की प्रतिमा का किया निर्माण*
*🌺प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और आने वाली पीढ़ियों के लिए हरित भविष्य का दिया प्रेरणादायी संदेश*
ऋषिकेश, 11 सितम्बर। परमार्थ निकेतन गुरुकुल में ऋषिकुमारों के लिये भगवान श्री गणेशजी की पर्यावरण-अनुकूल प्रतिमा निर्माण कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस अवसर पर ऋषिकुमारों ने प्राकृतिक मिट्टी से भगवान श्री गणेशजी की सुंदर प्रतिमाओं का निर्माण किया। यह कार्यशाला सनातन संस्कृति में निहित प्रकृति-प्रेम, संवेदनशीलता, संस्कार और पर्यावरण संरक्षण की चेतना को जीवन में उतारने का एक सुंदर अवसर है।
परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने अपने संदेश में कहा कि श्री गणेश, विघ्नहर्ता हैं, वे हमारी बुद्धि को ऐसी दिशा देने वाले देवता हैं, जिसमें विकास और विनाश के बीच का अंतर समझ में आए। बुद्धि वही है जो प्रकृति को जीतने की नहीं, उसके साथ जीने की कला सिखाए।
उन्होंने कहा कि जब हमारे बच्चे अपने हाथों से मिट्टी को आकार देकर श्री गणेशजी का स्वरूप गढ़ते हैं, तब वे केवल एक प्रतिमा नहीं बना रहे होते, वे अपने भीतर एक विचार को आकार दे रहे होते हैं कि प्रकृति हमारी वस्तु नहीं, हमारी विरासत है; जल हमारा संसाधन नहीं, जीवन का आधार है और धरती केवल रहने का स्थान नहीं, हमारी आने वाली पीढ़ियों की अमानत है।
उन्होंने कहा कि मिट्टी से गणेश बनाना और उसी मिट्टी को सम्मानपूर्वक प्रकृति में लौटाना हमारे ऋषियों की उस जीवन-दृष्टि का स्मरण है, जिसमें सृष्टि से लिया गया प्रत्येक तत्व कृतज्ञता के साथ उसी सृष्टि को वापस करने की भावना रखता है।
कार्यशाला के दौरान ऋषिकुमारों ने पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ प्राकृतिक मिट्टी को अपने हाथों से आकार दिया। किसी ने भगवान श्री गणेश की सूंड को सुंदर स्वरूप दिया, किसी ने उनके विशाल कानों को आकार दिया और किसी ने उनके मुकुट तथा अन्य अलंकरणों को साकार किया। मिट्टी के प्रत्येक कण के साथ उनकी सृजनशीलता, श्रद्धा और प्रकृति के प्रति आत्मीयता भी अभिव्यक्त होती रही।
श्री गणेशजी की पर्यावरण-अनुकूल प्रतिमा निर्माण के माध्यम से ऋषिकुमारों ने यह संदेश दिया कि उत्सव वही सुंदर है जो आनंद दे, आस्था जगाए और प्रकृति को आहत न करे। पर्व-त्योहार हमारे जीवन में रंग, उल्लास और ऊर्जा भरते हैं; अब आवश्यकता है कि इन उत्सवों में पर्यावरण के प्रति करुणा और जिम्मेदारी का रंग भी उतना ही गहरा हो।
ऋषिकुमारों के हाथों बनी श्री गणेशजी की प्रतिमाएँ मानो इसी प्रश्न का उत्तर है कि मिट्टी में आकार लेते गणेशजी और मन में आकार लेता पर्यावरण-संरक्षण का संकल्प, यही इस कार्यशाला की सबसे बड़ी उपलब्धि है।




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