शनिवार, 19 सितंबर 2026

परमार्थ निकेतन पहुँचे राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के माननीय अध्यक्ष हरजीत सिंह ग्रेवाल






 मुकेश गुप्ता

ऋषिकेश 19 सितंबर।  माँ गंगा के पावन तट पर स्थित परमार्थ निकेतन में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, भारत सरकार के माननीय अध्यक्ष श्री हरजीत सिंह ग्रेवाल जी का दर्शनार्थ आगमन हुआ। उन्होंने परमार्थ निकेतन में विश्राम कर सायंकालीन दिव्य परमार्थ गंगा आरती में सहभाग किया तथा परमार्थ पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी से आत्मीय भेंटवार्ता की।

माँ गंगा की निर्मल धारा, हिमालय की दिव्य छाया और मंत्रोच्चार से गुंजायमान परमार्थ निकेतन का आध्यात्मिक वातावरण में उन्होंने दिव्य गंगा आरती की। गंगाजी की आरती के पश्चात पूज्य स्वामी जी और हरजीत सिंह ग्रेवाल के मध्य भारतीय संस्कृति, सनातन दर्शन, प्रकृति संरक्षण, सामाजिक समरसता, सेवा तथा भावी पीढ़ियों के संस्कारों सहित अनेक समसामयिक और शाश्वत विषयों पर सार्थक एवं आत्मीय संवाद हुआ।

पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भारत की संस्कृति जीवन को देखने की एक व्यापक दृष्टि है। सनातन का मूल भाव ही है, समस्त सृष्टि में एक ही चेतना का दर्शन। हमारी प्रार्थनाएँ केवल अपने लिए नहीं, बल्कि सर्वे भवन्तु सुखिनः की मंगलकामना से प्रारम्भ होती हैं। यही दृष्टि भारत को विविधताओं के मध्य एकात्मता और सह-अस्तित्व का संदेश देती है।

उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता केवल विकास की नहीं, बल्कि विकास के साथ विवेक, प्रगति के साथ प्रकृति और आधुनिकता के साथ अपनी जड़ों से जुड़ाव की है। आने वाली पीढ़ियों को हम केवल भौतिक संसाधनों की विरासत न दें, बल्कि उन्हें ऐसी संस्कृति भी दें जो उन्हें करुणा, कर्तव्य, संयम, सेवा और सह-अस्तित्व का मार्ग दिखाए।

वार्ता के दौरान युवा पीढ़ी और संस्कारों पर भी विशेष चर्चा हुई। पूज्य स्वामी जी ने कहा कि तकनीक ने दुनिया को अभूतपूर्व रूप से जोड़ा है, परन्तु मनुष्य को अपने भीतर से जोड़ना भी उतना ही आवश्यक है। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों, उत्तरदायित्व और संवेदनशील नागरिकता का निर्माण भी होना चाहिए। आधुनिक ज्ञान और भारतीय जीवन-मूल्यों का समन्वय ही एक संतुलित एवं सशक्त भविष्य का आधार बन सकता है।


 हरजीत सिंह ग्रेवाल ने परमार्थ निकेतन के आध्यात्मिक एवं सेवामूलक वातावरण की सराहना करते हुये कहा कि भारतीय संस्कृति की शक्ति उसके संवाद, सह-अस्तित्व और विविधता में एकता के भाव में निहित है। उन्होंने कहा कि समाज में परस्पर सम्मान, सद्भाव और सहयोग की भावना को सुदृढ़ करने के लिए ऐसे आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक केन्द्रों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, जहाँ विभिन्न पृष्ठभूमियों के लोग एक साथ आकर भारतीय जीवन-दृष्टि का अनुभव कर सकें।


उन्होंने कहा कि आज भारत के सामने एक अद्भुत अवसर है, वह अपनी आध्यात्मिक विरासत, सांस्कृतिक चेतना और पर्यावरणीय ज्ञान को आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ जोड़कर विश्व के समक्ष एक ऐसा जीवन-मॉडल प्रस्तुत कर सकता है, जिसमें विकास भी हो, धरती का संरक्षण भी; तकनीक भी हो, मानवीय संवेदना भी; और समृद्धि भी हो, साथ ही शांति भी।

भेंट के दौरान पूज्य स्वामी जी ने हरजीत सिंह ग्रेवाल को रुद्राक्ष का पौधा भेंट किया। परमार्थ निकेतन के आध्यात्मिक वातावरण में सम्पन्न यह भेंट संवाद, संस्कृति, सेवा, प्रकृति और मानवता के साझा मूल्यों पर केन्द्रित एक सार्थक भेंट थी। दोनों ने इस बात पर बल दिया कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी प्राचीन जड़ों और भविष्य की संभावनाओं के सुंदर समन्वय में निहित है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें