कांवड़ यात्रा प्रकृति और संस्कृति, स्व और सृष्टि, संस्कार और सनातन के संरक्षण की यात्रा
ऋषिकेश, 24 जुलाई। परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने आज अन्तर्राष्ट्रीय सेल्फ केयर डे पर स्वयं की देखभाल के साथ सृष्टि की देखभाल का संदेश दिया। पूज्य स्वामी जी ने कहा कि आगामी कुछ दिनों में पवित्र कांवड़ यात्रा का शुभारम्भ हो रहा है, यह दिव्य यात्रा स्व के जागरण, संस्कृति संरक्षण और प्रकृति वंदन की दिव्य यात्रा है।
28 जुलाई से प्रारम्भ हो रही पवित्र कांवड़ यात्रा के लिए उत्तराखंड की धरती देशभर से आने वाले शिवभक्तों और कांवड़ियों के स्वागत-अभिनन्दन के लिए पूर्ण रूप से तैयार है। देवभूमि उत्तराखंड सदैव से श्रद्धा, साधना और सनातन संस्कृति की भूमि रही है। माँ गंगा के पावन तट और हिमालय की दिव्य गोद में होने वाली यह यात्रा अनेकों श्रद्धालुओं की आस्था, विश्वास और भक्ति का अद्भुत संगम है।
इस वर्ष की कांवड़ यात्रा प्रकृति और संस्कृति, स्व और सृष्टि, संस्कार और सनातन के संरक्षण की यात्रा बने, यही सभी का संकल्प होना चाहिए। भगवान शिव यहां के कण-कण में विद्यमान हैं। जब शिव का जलाभिषेक करते हैं, तो उसी भाव से धरती का भी अभिषेक करें; जब गंगाजल लेकर चलते हैं, तो गंगा की निर्मलता और पवित्रता को बनाए रखने का संकल्प भी साथ लेकर चलें। कांवड़ यात्रा, चेतना की यात्रा है, जो संदेश देती है कि भक्ति और जिम्मेदारी साथ-साथ चलती हैं।
आइए, इस बार कांवड़ यात्रा को प्लास्टिक मुक्त, स्वच्छ और पर्यावरण अनुकूल यात्रा बनाने का संकल्प लें। यात्रा मार्ग में लगने वाले भंडारे सेवा और श्रद्धा के केंद्र होते हैं। सभी सेवा संस्थाएं और श्रद्धालु इन भंडारों में प्लास्टिक प्लेट, गिलास और पॉलीथिन के स्थान पर पत्तल, मिट्टी के बर्तन, स्टील के बर्तन और अन्य पर्यावरण अनुकूल उत्पादों का उपयोग करें। यह छोटी-सी पहल माँ गंगा और प्रकृति के प्रति हम अपनी जिम्मेदारी निभा सकते हैं।
कांवड़ यात्रा के दौरान कुछ महत्वपूर्ण संकल्प लें। हर श्रद्धालु कम से कम एक पौधा लगाकर या पौधों के संरक्षण का संकल्प लेकर यात्रा को हरित यात्रा बनायें। मां गंगा में किसी भी प्रकार का कचरा, पूजा सामग्री या प्लास्टिक न डालें। माँ गंगा केवल हमारी आस्था नहीं, बल्कि हमारी जीवनदायिनी धरोहर भी हैं। उत्तराखंड की सुंदरता और संवेदनशील पारिस्थितिकी को ध्यान में रखते हुए ध्वनि प्रदूषण, कूड़ा-कचरा और प्राकृतिक संसाधनों के अनावश्यक दोहन से बचें। मार्ग में मिलने वाले जीव जन्तुओं, स्थानीय समुदाय और प्रकृति के प्रति सम्मान और सहयोग का भाव रखें। कांवड़ यात्रा में अनुशासन, संयम, शालीनता और सौहार्द का प्रदर्शन ही भगवान शिव की आराधना है।
भगवान शिव स्वयं प्रकृति के देव हैं। उनकी जटाओं में माँ गंगा विराजमान हैं, उनका वास कैलाश जैसे हिमालय में है और उनका स्वरूप समस्त सृष्टि से जुड़ा हुआ है। इसलिए शिव की पूजा का अर्थ केवल अभिषेक करना नहीं, बल्कि उस सृष्टि की रक्षा करना भी है जिसे शिव ने धारण किया है।
आइए, इस कांवड़ यात्रा को केवल गंगाजल लाने की यात्रा न बनाकर मां गंगा, हिमालय और धरती माता के प्रति कृतज्ञता की यात्रा बनाएं। ऐसी यात्रा जिसमें भक्ति की शक्ति हो, संस्कृति की गरिमा हो, प्रकृति का संरक्षण हो और मानवता का संदेश हो।

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