श्रीमहंत नारायण गिरि महाराज से गुरू दीक्षा लेने के लिए देश भर से हजारों भक्त मंदिर पहुंचेंगे
महाराजश्री बोले, सच्चे मन से गुरु का पूजन करने से ज्ञान, सफलता, सुख-समृद्धि तथा जीवन की बाधाओं से मुक्ति मिलती है
गाजियाबादः सिद्धपीठ श्री दूधेश्वर नाथ मठ महादेव मंदिर में बुधवार को गुरू पूर्णिमा पर्व पर गुरू भक्ति, श्रद्धा, विश्वास व आस्था कसा मेला लगेगा। मंदिर में आयोजित गुरू पूर्णिमा महोत्सव में मंदिर के पीठाधीश्वर जूना अखाड़ा के अंतर्राष्ट्रीय प्रवक्ता, दिल्ली संत महामंडल के राष्ट्रीय अध्यक्ष व जूना अखाड़ा की 13 मढ़ी के अध्यक्ष व हिंदू यूनाइटिड फ्रंट के अध्यक्ष श्रीमहंत नारायण गिरि महाराज से दीक्षा लेने के लिए देश भर से हजारों भक्त मंदिर पहुंचेंगे, जिसके लिए मंदिर में विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं। मंदिर के मीडिया प्रभारी एस आर सुथार ने बताया कि बुधवार को सर्वप्रथम भगवान दूधेश्वर नाथ, भगवान दत्तात्रेय समेत सभी देवी-देवताओं, सभी सिद्ध संत समाधियों व महर्षि वेद व्यास का पूजन होगा। उसके बाद भक्त महाराजश्री का पूजन करेंगे। उनसे गुरू दीक्षा लेने का समय प्रातः 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक का रहेगा। श्रीमहंत नारायण गिरि महाराज से गुरू दीक्ष़्ाा लेने के लिए देश भर से भक्त आ रहे हैं, इसी कारण विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं ताकि किसी भी भक्त को कोई परेशानी ना हो। श्रीमहंत नारायण गिरि महाराज ने कहा कि गुरू पूर्णिमा पर्व का सनातन धर्म में बहुत अधिक महत्व है। यह दिन गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व है। गुरु की महिमा अपरंपार है। गुरु के बिना ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती है। गुरू ही भक्त को अज्ञान रूपी अंधकार से बाहर निकालकर ज्ञान रूपी प्रकाश से उसके जीवन को प्रकाशित करता है और उसे अच्छे-बुरे का ज्ञान देकर व उसका सही मार्गदर्शन कर उसके जीवन को सफल व धन्य बनाता है। बिना गुरू के परमात्मा का साक्षात्कार भी नहीं किया जा सकता है। यही कारण है कि गुरु को भगवान से भी ऊपर दर्जा दिया गया है। वास्तव में गुरू ईश्वर के ही प्रतिनिधि हैं। गुरू पूर्णिमा पर सच्चे मन से गुरु का पूजन करने से ज्ञान, सफलता, सुख-समृद्धि तथा जीवन की बाधाओं से मुक्ति मिलती है। महाराजश्री ने बताया कि गुरू पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं क्योंकि पुराणों, महाभारत और चारों वेदों के रचयिता महर्षि वेद व्यास का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को ही हुआ था। योग परंपरा के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव ने पहले गुरु के रूप में सप्तऋषियों को योग का ज्ञान देना शुरू किया था।

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