बुधवार, 14 जनवरी 2026

गाजियाबाद के भामाशाह, भगवान दूधेश्वर के अनन्य भक्त धर्मपाल गर्ग का निधन आध्यात्मिक व सामाजिक क्षेत्र की अपूरणीय क्षति हैः श्रीमहंत नारायण गिरि महाराज


                     रिपोर्ट--मुकेश गुप्ता

धर्मपाल गर्ग मकर संक्रांति के पावन दिन भगवत् धाम को गए

उनकी आस्था, श्रद्धा व सेवा कार्य उन्हें हमेशा लोगों के दिलों में बसाए रखेंगे

गाजियाबादः नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।

न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥ सिद्धपीठ श्री दूधेश्वरनाथ मठ महादेव मंदिर के पीठाधीश्वर, जूना अखाड़ा के अंतरराष्ट्रीय प्रवक्ता एवं दिल्ली संत महामंडल के अध्यक्ष श्रीमहंत नारायण गिरि महाराज ने कहा कि भगवान दूधेश्वरनाथ के अनन्य भक्त, धर्म व सेवा की मिसाल कायम करने वाले गाजियाबाद के भामाशाह धर्मपाल गर्ग के निधन से हर कोई दुखी है। उनका निधन आध्यात्मिक व सामाजिक क्षेत्र की ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती।

महाराजश्री ने कहा कि धर्मपाल गर्ग का पूरा जीवन धर्म व समाज सेवा के लिए समर्पित रहा। दूधेश्वरनाथ मंदिर से वे प्रारंभ से ही जुड़े थे और भगवान दूधेश्वरनाथ की नियमित रूप से पूजा-अर्चना करते थे। अस्वस्थता के समय भी उन्होंने भगवान की पूजा-अर्चना व समाज सेवा को निरंतर जारी रखा। उन्होंने वर्ष 2007 से 2014 तक श्री दूधेश्वरनाथ मठ महादेव मंदिर का जीर्णोद्धार कराकर उसकी पूरे विश्व में अलग पहचान बनाने का कार्य किया।

मंदिर में संत सनातन कुंभ हो या महाशिवरात्रि पर भक्तों की सेवा, वे हमेशा सबसे आगे रहते थे और भक्तों के लिए भंडारे व प्रसाद की व्यवस्था कराते थे। श्रावण शिवरात्रि पर वे कई दिन पहले से ही अपने भंडारे भक्तों की सेवा के लिए खोल देते थे। कांवड़ियों के साथ ही श्रावण शिवरात्रि पर आयोजित होने वाले महोत्सव में सहयोग देने वालों के लिए भंडारे व प्रसाद की व्यवस्था कराने के साथ उन्हें अपने हाथों से सम्मानित भी करते थे।

श्रीमहंत नारायण गिरि महाराज ने कहा कि धर्मपाल गर्ग कहते थे कि उन्हें जो कुछ भी मिला है, वह भगवान की कृपा व समाज के सहयोग से ही मिला है, इसलिए समाज के लिए वे जो कुछ भी करें, वह कम ही है। वे मीलों पैदल चलकर आने वाले कांवड़ियों को भगवान का रूप मानते थे, इसी कारण उनकी दिन-रात सेवा करते थे। अमरनाथ यात्रियों के लिए जम्मू-कश्मीर में लगने वाले भंडारे तथा महाकुंभ में साधु-संतों व श्रद्धालुओं के लिए लगने वाले भंडारों में भी उनका सदैव सहयोग रहता था।

बद्रीनाथ धाम में उन्होंने धर्मशाला का निर्माण कराया। हरिद्वार में भी उन्होंने धर्मशाला बनवाई। अनेक तीर्थ स्थलों का जीर्णोद्धार कराया।

श्रीमहंत नारायण गिरि महाराज ने कहा कि धर्मपाल गर्ग को भगवान दूधेश्वरनाथ का साक्षात् सानिध्य प्राप्त हुआ है। इसका प्रमाण यह है कि उन्होंने उत्तरायण के पुण्यकाल में, माघ मास के दौरान, एकादशी तिथि को अपने शरीर का त्याग किया। माघ मास, उत्तरायण और एकादशी तिथि—तीनों का संयोग अत्यंत दुर्लभ और पुण्यदायक माना जाता है। ऐसे पुण्य संयोग में देह त्याग करने वाले महापुरुष साक्षात् शिवलोक को प्राप्त होते हैं। यह गति विरले महापुरुषों को ही प्राप्त होती है। धर्मपाल गर्ग का शिवलोक गमन इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि वे भगवान दूधेश्वरनाथ के परम कृपापात्र भक्त थे।

धर्मपाल गर्ग भगवान के ऐसे सच्चे भक्त थे, जिनकी आस्था, श्रद्धा व सेवा हमेशा लोगों को प्रेरित करती रहेगी। वे भले ही आज हमारे बीच न हों, मगर उनके पुण्य कार्य सदैव उन्हें हमारे दिलों में बसाए रखेंगे।

दूधेश्वर वेद विद्यालय के समस्त आचार्यगण एवं छात्र उनके मुक्ति  तथा आत्मिक शांति के लिए निरंतर गीता पाठ कर रहे हैं, जिससे उनकी  आत्मा का शिवलोक में वास हो ।

दूधेश्वरनाथ परिवार के साथ श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा के समस्त गुरुमूर्तियों के और से  भी उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित  है।

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