शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

कविनगर रामलीला मैदान में आयोजित भव्य श्रीरामकथा का षष्ठम दिवस , हमें अपने पुराने कर्मो का फल अवश्य भोगना पड़ता है, राजा दशरथ भी इससे नहीं बच सके-- विजय कौशल

 





                         मुकेश गुप्ता

भरत का चरित्र नि:स्वार्थ प्रेम, कर्तव्य परायणता और आदर्श भातृ प्रेम का प्रतीक: विजय कौशल जी महाराज जी महाराज

- कथा व्यास ने छठे दिन की रामकथा में दशरथ मृत्यु व चित्रकूट में राम-भरत मिलाप का सुंदर वर्णन किया 

गाजियाबाद। कविनगर स्थित रामलीला मैदान में मंगलमय परिवार द्वारा आयोजित भव्य श्रीरामकथा के षष्ठम दिवस शुक्रवार को जब कथा व्यास पूज्य संत विजय कौशल जी महाराज की दशरत मृत्यु व भरत मिलाप का संजीव वर्णन किया तो वहां मौजूद श्रद्धालुओं को आंखें रामभक्ति में भावुकता के कारण नम हो गयीं। 

कथा व्यास विजय कौशल महाराज ने अपन श्रीमुख से रामकथा के छठे दिन अयोध्या के राजा दशरथ के राम के वन जाने के पश्चात उनके वियोग में मृत्यु के वरण करने और चित्रकूट जाकर भरत को अपने अग्रज भ्राता राम के साथ हुए मिलाप के भावपूर्ण प्रसंग का बहुत ही सुंदर वर्णन किया। दशरथ का विलाप और भरत-राम मिलन के दृश्य ने कथास्थल को भावुक कर दिया। महाराज ने भरत के प्रेम और त्याग की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि भरत का चरित्र नि:स्वार्थ प्रेम, कर्तव्य परायणता और आदर्श भातृ प्रेम का प्रतीक है। आज के समय में ऐसे भाव वाले भाई का मिलना असंभव है। 

विजय कौशल जी महाराज ने हमें अपने पुराने कर्मो का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है। राजा दशरथ भी इससे नहीं बच सके थे। रामकथा में राजा दशरथ की मृत्यु राम के वनवास के दुख में हुई, जो श्रवण कुमार के माता-पिता के श्राप का परिणाम था। भरत एक आदर्श भाई थे। उन्होंने अपनी माता कैकेयी की उन्हें राजा बनाने की योजना को अस्वीकार करके वे अपने बड़े भाई राम को वापस लाने के लिए चित्रकूट गये। लेकिन श्रीराम द्वारा उनकी वापस अयोध्या लौटने की विनती अस्वीकर कर दिया, क्यों राम ने अपने पिता का वचन निभाना था। जब राम ने अयोध्या लौटने में असमर्थता जतायी तो भरत उनकी पादुकाएं लेकर आये और उन्हें सिंहासन पर रखकर 14 वर्षो तक स्वयं भी तपस्वी का जीवन बिताया। 


विजय कौशल जी महाराज ने कहा कि राजा दशरथ से जाने-अनजाने में श्रवण कुमार का वध हो गया था और श्रवण के अंधे माता-पिता ने स्वयं तो प्राण त्याग ही दिये थे। उन्होंने राजा दशरथ को भी पुत्र वियोग में प्राण त्यागने का श्राप दिया था। 

उन्होंन कहा कि राम अपने वचनों के पक्के थे। पिता दशरथ की आज्ञा से ही राम वन गये और इसके पीछे राजा दशरथ का कैकेयी के दिये गये वचनों को पूरा करना था। श्राप के चलते ही पुत्र मोह में राजा दशरथ ने छठवें दिन रघुकुल शिरोमणि राम का नाम लेते हुए प्राण त्याग थे। 

कथा का वृतांत सुनाते हुए पूज्य संत ने आगे बताया कि राजा दशरथ कैकयी के कर रह जाते हैं और श्री राम को वनवास के बाद भरत ने 14 साल तक नदी ग्राम से राजपाठ संभाला था। महाराज श्री ने कहा कि हमें अपने कर्तव्य के पथ से कभी पीछे नहीं हठना चाहिए। यह हम भरत के चरित्र से सीख लेते हैं। 

पूज्य श्री विजय कौशल जी महाराज के पावन श्रीमुख से प्रवाहित रामकथा के षष्ठम दिवस में भरत के निस्वार्थ प्रेम, कर्तव्यपरायणता और आदर्श भातृ प्रेम को बहुत ही सुंदर ढंग से वर्णन किया। शनिवार को कथा का सातवां व अंतिम दिन है। मंगलयम परिवार ने सभी भक्तों से अंंतिम दिन कथा सुनने आने का आग्रह किया है, ताकि वे इस भव्य रामकथा का लाभ उठा सकें। कथा के विधायक नंद किशोर गुर्जर, उधोगपति संजीव गुप्ता ,भाजपा नेता भानू शिशोदिया आदि को महाराज जी द्वारा सम्मानित किया गया।


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