मुकेश गुप्ता
गाजियाबाद । कविनगर रामलीला मैदान में मंगलमय परिवार, गाजियाबाद द्वारा आयोजित भव्य श्री राम कथा के तृतीय दिवस पर आज श्रद्धा, भक्ति, करुणा, शौर्य और मंगलमय वैवाहिक प्रसंगों का अद्भुत संगम देखने को मिला। पूज्य संत श्री विजय कौशल जी महाराज ने आज की कथा में प्रभु श्रीराम के बाल्यकाल की सुकुमारता, धर्म-रक्षा हेतु किए गए उनके वीरतापूर्ण कर्म, मिथिला की दिव्य सुषमा तथा राम-सीता विवाह की मंगल भूमिका का अत्यंत भावपूर्ण, रसपूर्ण और हृदयस्पर्शी वर्णन किया।
कथा के तृतीय सोपान पर महाराज श्री ने श्रद्धालुओं को यह अनुभूति कराई कि प्रभु श्रीराम का जीवन केवल आदर्शों का संग्रह नहीं, बल्कि हर युग के मानव के लिए मार्गदर्शक प्रकाश है। उन्होंने कहा कि बालक श्रीराम की प्रत्येक लीला लोकमंगल, करुणा और धर्म की रक्षा के संकल्प से जुड़ी हुई है।
बाल्यावस्था का माधुर्य—
महाराज श्री ने प्रभु श्रीराम के बाल-स्वरूप का ऐसा मनोहारी चित्रण किया कि समूचा पंडाल भाव-विभोर हो उठा। माता कौशल्या के आंगन में खेलते, हंसते और लीलाएं करते बालक राम की सुकुमारता, सरलता और करुणामय मुस्कान का वर्णन सुनकर श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। उन्होंने बताया कि बालक राम की निष्कलुष मुस्कान में भी भविष्य के मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की झलक दिखाई देती है।
धर्म-रक्षण और ताड़का-वध की शौर्यगाथा—
विश्वामित्र मुनि के साथ वन-गमन के प्रसंग में महाराज श्री ने अत्यंत प्रभावशाली शैली में बताया कि किस प्रकार बालक श्रीराम ने अधर्म के प्रतीक ताड़का का वध कर धर्म की रक्षा का संकल्प निभाया। उन्होंने कहा कि प्रभु श्रीराम का यह पराक्रम यह संदेश देता है कि अन्याय, अत्याचार और अधर्म के विरुद्ध खड़ा होना ही सच्चा धर्म है। ताड़का-वध का प्रसंग सुनाते समय पंडाल “जय श्रीराम” के जयघोष से गूंज उठा।
मिथिला का ऐश्वर्य और पुष्प-वाटिका—
महाराज श्री ने मिथिला नगरी की दिव्य सुषमा, जनकपुर के वैभव और पुष्प-वाटिका के मनोरम दृश्य का अत्यंत सुंदर और काव्यात्मक वर्णन किया। उन्होंने बताया कि पुष्प-वाटिका में ही प्रभु श्रीराम और माता सीता का प्रथम साक्षात्कार हुआ, जिसने आगे चलकर सीता-राम विवाह की मंगल भूमिका रची। इस प्रसंग ने श्रोताओं के हृदय में प्रेम, सौंदर्य और आध्यात्मिक आनंद का संचार कर दिया।
राम विवाह की मंगल भूमिका—
पूज्य महाराज श्री ने आज की कथा में राम विवाह प्रसंग की भी अत्यंत भावपूर्ण झांकी प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि शिव धनुष भंग के पश्चात जब राजा जनक ने माता सीता का पाणिग्रहण प्रभु श्रीराम के साथ संपन्न करने की घोषणा की, तब सम्पूर्ण मिथिला आनंद, उल्लास और मंगलगान से गूंज उठी। महाराज श्री ने कहा कि राम-सीता विवाह केवल दो आत्माओं का मिलन नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा, प्रेम और त्याग के आदर्शों का पवित्र संगम है। इस प्रसंग को सुनकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे और पंडाल में मंगल ध्वनियों और “सीता-राम” के जयघोष से वातावरण भक्तिमय हो गया।
आयोजन की विलक्षणता—
यह आयोजन केवल कथा-श्रवण तक सीमित नहीं है, बल्कि श्रद्धालुओं को “लघु अयोध्या” का साक्षात अनुभव करा रहा है। अयोध्या के श्रीराम मंदिर की तर्ज पर निर्मित भव्य परिसर, रामलला के दिव्य दर्शन, श्रीराम मंदिर निर्माण से जुड़े 500 वर्षों के संघर्ष और कारसेवकों के बलिदान की गौरवमयी प्रदर्शनी, तथा पुंगनूर गौ-माता का पावन सान्निध्य इस पूरे क्षेत्र को सिद्ध क्षेत्र का स्वरूप प्रदान कर रहे हैं। श्रद्धालु यहां दर्शन के साथ-साथ आध्यात्मिक ऊर्जा और ऐतिहासिक चेतना दोनों का अनुभव कर रहे हैं।
भक्तों की अपार सहभागिता—
देश-विदेश से आए हजारों श्रद्धालुओं ने आज पूज्य महाराज श्री के श्रीमुख से अमृतमयी रामकथा का रसपान किया। संपूर्ण वातावरण भक्ति-रस, शांति और दिव्यता से ओतप्रोत रहा। कथा स्थल पर “जय श्रीराम” और “हरि बोल” के जयघोष से आकाश गूंज उठा।
मंगलमय परिवार का संदेश—
मंगलमय परिवार ने सभी श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे आगामी दिनों की रामकथा में सपरिवार उपस्थित होकर इस दिव्य आयोजन का पुण्य लाभ प्राप्त करें और अपने जीवन को प्रभु श्रीराम के आदर्शों से आलोकित करें।


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