बुधवार, 28 जनवरी 2026

मंगलयम परिवार की ओर से आयोजित श्रीराम कथा का चतुर्थ दिवस, राम-सीता विवाह सामाजिक अनुष्ठान ही नहीं बल्कि धर्म, मर्यादा, त्याग और परस्पर सम्मान का सर्वोच्च आदर्श: संत विजय कौशल जी महाराज

 




                            मुकेश गुप्ता

सीता राम विवाहोत्सव के भावपूर्ण, भव्य और सुमधुर वर्णन से भावविभोर हुए श्रद्धालु

-जीवन के हर चरण में कर्तव्य, संयम, सहनशीलता और समर्पण का संकल्प निहित 

-पिताश्री दशरथ की आज्ञा से राम का वन गमन त्याग और कर्तव्य की सीख 

-पूज्य महाराज ने मिथिला का मंगल, अवध की मर्यादा और वन गमन का त्याग से लेकर सीता राम विवाहोत्सव की कथा सुनाई

गाजियाबाद। कविनगर स्थित रामलीला मैदान में गत 25 जनवरी से चल रही श्री रामकथा के चतुर्थ दिवस पंडाल में आये समस्त श्रद्धालु मिथिला के मंगलोत्सव और अवध की मर्यादा में डूब गये। कथा वाचक विजय कौशल जी महाराज ने बुधवार को रामकथा कके पावन प्रसंगों में श्रीरामलला सरकार एवं माता श्री जानकी के शुभ विवाह एवं भंवरों (फेरों) का अत्यंत भावपूर्ण, भव्य और दिव्य वर्णन प्रस्तुत किया, जिस सुनकर वहां मौजूद हजारों श्रद्धालु बहुत की भावविभोर हो गये।

पूज्य कथा-व्यास विजय कौशल महाराज ने अपने श्रीमुख से जैसे ही राम जानकी विवाह का मंगल प्रसंग सुनना शुरु किया, पूरा कथा-पंडाल साक्षात मिथिला बन गया। महाराज जी ने जनकपुर की अलौकिक शोभा, जनक दरबार की गरिमा, सखियों के उल्लास, मंगल गीतों और विवाह की दिव्यता का ऐसा सजीव चित्रण किया कि पंडाल में मौजूद हर श्रोता स्वयं को उस पावन क्षण का सहभागी अनुभव करने लगा।

रामकथा में महाराज  द्वारा विवाहोत्सव की शानदार प्रस्तुति से ऐसे लगा कि मिथिला का कण-कण खिल उठा हो और जनकपुर वासियों को जमाई के रुप में राजा राम मिलने से वे धन्य हो गये हों। इस भाव के साथ सखियों की कल्पना, ढोल मंजीरों की थाप और भजनों की मधुर धारा ने पंडाल को और भी आनंदित कर दिया। आज श्रद्धालु सज-धज कर प्रभु के विवाहोत्सव में शामिल होने पहुंचे थे। राम विवाह के प्रसंग के दौरान उन्होंने द्वारा लगाये गये भगवान राम व माता जानकी के जयघोष से संपूर्ण वातावरण गुंजायमान हो ।

महाराज जी ने विवाह का आध्यात्मिक संदेश बताया

पूज्य संत विजय कौशल महाराज ने कथा श्रवण कराने के दौर रामभक्तों को सीख भी दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि राम सीता विवाह केवल सामाजिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा, त्याग और परस्पर सम्मान का सर्वोच्च आदर्श है। उन्होंने बताया कि माता सीता और प्रभु श्रीराम का यह मिलन समस्त मानवता को यह सिखाता है कि जीवन में प्रेम तभी पूर्ण होता है, जब वह धर्म से जुड़ा हो।

विवाह के दौरान होने वाले भंवरों के बारे में विजय कौशल जी महाराज ने प्रत्येक फेरे के आध्यात्मिक अर्थ को सरल शब्दों में समझाया। उन्होंने कहा कि जीवन के हर चरण में कर्तव्य, संयम, सहनशीलता और समर्पण का संकल्प निहित है। इस प्रसंग ने श्रोताओं की आँखों को नम कर दिया और हृदय को भक्ति-रस से भर दिया

पिताश्री दशरथ की आज्ञा से राम का वन गमन त्याग और कर्तव्य की सीख 

विवाहोत्सव के उल्लास के पश्चात जब राम वन गमन का प्रसंग आया, तो वातावरण भावनात्मक रूप से अत्यंत गंभीर और प्रेरक हो गया। महाराज जी ने बताया कि कैसे वैवाहिक सुख, राज्याभिषेक और राजसी वैभव को त्याग कर प्रभु श्रीराम ने पिता की आज्ञा और धर्म पालन को सर्वोपरि माना। यह प्रसंग श्रोताओं को यह संदेश देता है कि सच्चा धर्म वही है, जहाँ व्यक्तिगत सुख से पहले कर्तव्य आता है।

आज चतुर्थ दिवस में श्रद्धालुओं की उपस्थिति अत्यंत उत्साहजनक रही। भक्ति, अनुशासन और भावनात्मक जुड़ाव के साथ रामभक्तों ने कथा का रसपान किया। सुसज्जित पंडाल, दिव्य सजावट, भजनों की मधुर प्रस्तुति और श्रद्धालुओं की आस्था—इन सभी ने मिलकर इस दिवस को अविस्मरणीय बना दिया।

श्रीरामकथा का यह चतुर्थ दिवस श्रद्धा, प्रेम, त्याग और मर्यादा का जीवंत संदेश देकर भक्तों के हृदय में सदा के लिए अंकित हो गया।


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