मुकेश गुप्ता
श्री राम का वन गमन धर्म, वचन और मर्यादा को राजसुख से ऊपर प्रतिष्ठित करता है
-श्री राम की एक तपस्वी के रुप से शुरु हुई यात्रा जीवन में मोह का त्याग और संयम का वरण है
-माता कौशल्या की करुण पुकार, भरत का विलाप और प्रजा की व्याकुलता के प्रसंगों से श्रोताओं के नेत्र सजल हुए
गाजियाबाद। कविनगर स्थित रामलीला मैदान में मंगलमय परिवार द्वारा आयोजित भव्य श्रीरामकथा के पांचवें दिन गुरुवार को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के वनगमन का अत्यंत करुण, भावोत्तेजक एवं आत्मा को स्पर्श करने वाला प्रसंग प्रस्तुत किया गया। कथा स्थल पर उपस्थित श्रद्धालु जनसमूह इस प्रसंग को सुनकर भाव-विभोर हो उठा और सम्पूर्ण वातावरण त्याग, भक्ति तथा करुणा से सराबोर हो गया।
पूज्य विजय कौशल जी महाराज के पावन श्रीमुख से प्रवाहित रामकथा के पंचम दिवस में प्रभु श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी से लेकर वनगमन, निषादराज गुह से भेंट और केवट की निष्काम भक्ति तक की घटनाओं का अत्यंत सजीव, रसपूर्ण और भावनात्मक वर्णन किया गया।
महाराजश्री ने कोप भवन प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया कि कैसे एक ओर अयोध्या में राजतिलक की मंगल तैयारी चल रही थी, वहीं दूसरी ओर माता कैकेयी के वचनों से सम्पूर्ण वातावरण क्षण भर में शोक में परिवर्तित हो गया। महाराजश्री ने कहा कि यह प्रसंग केवल राजनैतिक परिवर्तन नहीं, बल्कि उस क्षण का प्रतीक है जहाँ धर्म, वचन और मर्यादा राजसुख से ऊपर प्रतिष्ठित हो जाते हैं।
विजय कौशल जी महाराज ने कथा सुनाते हुए उनके वन गमन का प्रसंग बहुत ही सुंदर ढंग से वर्णित किया। महाराजश्री ने कहा कि प्रभु श्रीराम का वनगमन संसार को यह सिखाता है कि जीवन में धर्म की रक्षा के लिए त्याग ही सबसे बड़ा आभूषण है। उन्होंने आगे कहा कि जैसे ही प्रभु श्रीराम के वनगमन का निर्णय सामने आया, अयोध्या शोक में डूब गई। माता कौशल्या की करुण पुकार, भरत का विलाप और प्रजा की व्याकुलता आदि के प्रसंगो को सुनकर श्रोताओं के नेत्र सजल हो गये।
उन्होंने कहा कि अयोध्या की सीमा पार कर तमसा नदी के तट पर प्रभु द्वारा बिताई गई पहली रात्रि का वर्णन विशेष रूप से मार्मिक रहा। कथा व्यास ने बताया कि यह वही क्षण है जहाँ राजकुमार राम से तपस्वी राम की यात्रा आरंभ होती है—जहाँ मोह का त्याग और संयम का वरण होता है।
कथा व्यास विजय कौशल जी महाराज ने निषादराज गुह से भेंट का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि श्रृंगवेरपुर पहुँचने पर प्रभु श्रीराम की बालसखा निषादराज गुह से भेंट का प्रसंग सामाजिक समरसता और सच्ची मित्रता का जीवंत उदाहरण बनकर सामने आया। महाराजश्री ने कहा कि निषादराज का पलक-पावड़े बिछाकर स्वागत यह सिद्ध करता है कि प्रभु के लिए जाति, वर्ग और स्थिति का कोई भेद नहीं—वहाँ केवल प्रेम और भाव की ही पहचान है।
गुरुवार की कथा का भावनात्मक शिखर रहा केवट प्रसंग। पूज्य संत विजय कौशल जी ने अत्यंत कोमल शब्दों में बताया कि जब प्रभु श्रीराम ने गंगा पार करने हेतु नाव मांगी, तब केवट ने प्रभु के चरणों की रज को पारस बताते हुए पहले चरण धोने की अनुमति मांगी। यह प्रसंग केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि उस क्षण का प्रतीक है जहाँ भक्त अपने प्रेम से भगवान को बाँध लेता है। केवट द्वारा उतराई लेने से इनकार कर प्रभु से भवसागर से पार उतारने का वचन माँगना, निष्काम भक्ति की सर्वोच्च अवस्था को दशार्ता है—जहाँ सांसारिक लाभ नहीं, केवल मुक्ति की कामना होती है।
कथा के समापन पर प्रभु श्रीराम के ऋषि भरद्वाज के आश्रम आगमन का वर्णन किया गया। उन्होंने वनवासी जीवन की मर्यादा, संयम और सन्यास धर्म के आदर्शों को स्थापित किया। महाराजश्री ने कहा कि यह प्रसंग मानव जीवन को संयम, संतोष और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
आज की श्रीरामकथा ने उपस्थित श्रद्धालुओं के हृदय में यह भाव गहराई से स्थापित कर दिया कि त्याग में ही सच्चा सुख है, भक्ति में ही मुक्ति है और मयार्दा ही जीवन का सर्वोच्च धर्म है। कथा में मंगलमय परिवार के सदस्यों सहित हजारों रामभक्तों ने कथा श्रवण कर भगवान राम के नाम का धार्मिक लाभ लिया।
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